प्राण प्रिये

वेदना संवेदना निश्चल कपट

को त्याग बढ़ चली हूँ मैं

हर तिमिर की आहटों का पथ

बदल अब ना रुकी हूँ मैं

साथ दो न प्राण लो अब

चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

 

निश्चल हृदय की वेदना को

छुपते हुए क्यों ले चली मैं

प्राण ये चंचल अलौकिक

सोचते तुझको प्रतिदिन

आह विरह का त्यजन कर

चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

 

अपरिमित अजेय का पल

मृदुल मन में ले चली मैं

तुम हो दीपक जलो प्रतिपल

प्रकाश सौरभ बन चलो अब

चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

 

मौन कर हर विपट पनघट

साथ नौका की धार ले चली मैं

मृत्यु की परछाई में सुने हर

पथ की आस ले चली मैं

दूर से ही साथ दो अब

चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

— दीप्ति शर्मा