यादें

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जिंदगी की पोटली में
बंधी वो सुनहरी यादें
यूँ बेनकाब हो रही हैं
जैसे किसी पिंजड़े से
वो आजाद हो रही हैं ।

तिरछे आईने को भेद
उमड़ घुमड़ रही वो
बाहर आने की चेष्टा
बयां कर रही हैं ।

अन्तरमन में छुपे होने
का अहसास कर
और असहाय होकर
मन से बाहर निकल
सरेराह हो रही है ।
वो आजाद हो रही है ।
© दीप्ति शर्मा

 

  • sangeeta swarup

    आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल  कल रविवार को   08  -07-2012  को यहाँ भी है 
     ….  आज  हलचल में  ….  आपातकालीन हलचल  .

  • Vrani Shrivastava

    अन्तरमन में छुपे होनेका अहसास करऔर असहाय होकरमन से बाहर निकलसरेराह हो रही है ।अन्तरमन के यादें  को
    असहाय होने का अहसास  …. ओह ….
    उत्तम रचना …. !!